Yagya

yagya vigyan

यज्ञों के प्रभाव , भेषज यज

ऋतु-सन्धि तथा दिन-रात की सन्धि यज्ञ करने के लिए सर्वोपयुक्त काल है। सन्धिकाल, संक्रमणकाल होता है। प्रकाश ऋण, धन भागों में विभक्त हो जाता है, यह रोग-कीटाणुओं की वृद्धि के लिए बड़ा ही अनुकूल समय होता है और उसकी आक्रमण शक्ति भी इस समय बढ़ जाती है। संख्या और शक्ति बढ़ जाने से ये निरोग शरीर को भी रोगी बनाने का साहस करने लगते हैं।

यज्ञ में रोग निरोधक शक्ति है। उससे प्रभावित शरीरों पर सहज ही में रोगों के आक्रमण नहीं होते हैं। यज्ञाग्नि में जो जड़ी-बूटी, शाकल्य आदि होम किए जाते हैं वे अदृश्य तो हो जाते हैं पर नष्ट नहीं होते। सूक्ष्म बनकर वे वायु में मिल जाते हैं और व्यापक क्षेत्र में पैलकर रोगकारक कीटाणुओं को खत्म करने लगते हैं। यज्ञ धूम्र की इस शक्ति को प्राचीन काल में भली प्रकार परखा गया था। इसका उल्लेख शास्त्रों में स्थान-स्थान पर उपलब्ध है। जैसे- यजुर्वेद में कहा गया है अग्नि में प्रक्षिप्त जो रोगनाशक, पुष्टि प्रदायक और जलादि संशोधक हवन सामग्री है, वह भस्म होकर वायु द्वारा बहुत दूर तक पहुँचती है और वहाँ पहुँचकर रोगादिजनक घटकों को नष्ट कर देती है। इसी तरह अथर्ववेद में कहा गया है- “अग्नि में डाली हुई हवि रोग कृमियों को उसी प्रकार दूर बहा ले जाती है, जिस प्रकार नदी पानी के झागों को बहा ले जाती है। यह गुप्त से गुप्त स्थानों में छिपे हुए घातक रोगकारक जीवाणुओं को नष्ट कर देती है।
यज्ञाग्नि से बची हुई भस्म का भी औषधियों की तरह प्रयोग किया जाता है। इसी तरह के प्रयोग-परीक्षण चिली, पोलैण्ड तथा पश्चिम जर्मनी में भी चल रहे हैं। इन प्रयोगों में न केवल अनेक वनौषधियाँ प्रयुक्त होती हैं, वरन् अनेक स्तर की समिधाओं का भी एक दूसरे से भिन्न प्रकार का प्रतिफल पाया गया है। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि जिन क्षेत्रों में इस प्रकार के यज्ञ आयोजन हुए हैं, वहाँ अपराधों की संख्या कम हुई है। मानसिक तनाव एवं पारस्परिक द्वेष कम हुए हैं, यज्ञ वातावरण की प्रत्यक्ष उप्लाव्धिया देखी गई हैं। जिन परिवारों में अग्निहोत्र का प्रचलन हुआ है, उनमें बीमारी के प्रकोप में कमी हुई है।

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सोलह संस्कारों मे यज्ञ

शास्त्रकारों ने ऐसे ४० मोड़ों को तलाशा उनमें से १६ को प्रमुख मानकर षोडश संस्कारों का प्रचलन किया। जिस तरह उपवन के पौधों और जंगली पेड़ों में एक मूलभूत अंतर होता है। उद्यान के वृक्ष स्वस्थ सुडौल और अधिक फल देते हैं, जबकि जंगली पेड़ों की डालें, तने सब अनगढ़ और अव्यवस्थित होते हैं। यह अंतर देखभाल करने वाले माली के पुरुषार्थ का प्रतिफल होता है। वह न केवल समय पर खाद–पानी देता है, अपितु काट–छाँट भी करता रहता है। संस्कार परम्परा भी व्यक्तित्व को निखारने की ऐसी ही स्वस्थ कला है। जो चिन्ह-पूजा के रूप में चल तो आज भी रही हैं, पर उनसे जुड़े लोकशिक्षण ने अब मात्र कर्मकाण्ड या खाने-पीने और मौज मनाने वाले कार्यक्रमों का रूप धारण कर लिया है। अतएव कुछ प्रतिफल नहीं निकल पाता है, ऐसी धारणा बनती जा रही है। पाँच माह की अवस्था में भू्रण का मस्तिस्क भाग बनना प्रारंभ होता है। यह एक तरह का शरीर का राज्याभिषेक पर्व है। पाँच माह में पुंसवन मनाने की परम्परा इसीलिए पड़ी। बीज को संस्कारित कर देने से पौधे स्वस्थ होते हैं यही इनका उद्देश्य है। हिन्दू संस्कार के अनुसार गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णभेद व विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह, अन्त्योष्ट और श्रद्धा यह सभी एक से एक बढ़कर महत्व आत्मसात किए हुए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सभी संस्कार उस आयु और अवस्था में सम्पन्न होते हैं जब उस तरह के विशेष मार्गदर्शन प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए बच्चे के शरीर का “हारमौनिक विकास ८ से १३ वर्ष की आयु में होता है। यह आयु जीवन का सबसे नाजुक मोड़ होती है। इसी आयु में अधिकांश बच्चे बिगड़ते हैं अतएव इसी आयु में यज्ञोपवीत या वृत-बंध रखा गया।” ब्रह्मचर्य आश्रम में इन सब बातों का विचार है। हमें क्या खाना चाहिए, क्या सुनना चाहिए, क्या देखना चाहिए, क्या पढ़ना चाहिए, वैसे बैठना चाहिए, कब उठना चाहिए आदि सब बातों का विवेकपूर्ण निश्चय करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का भी एक शास्त्र है। ब्रह्मचारी बननेवालों को उस शास्त्र के अनुसार आचरण करना चाहिए। इसीलिए गाँधीजी हमेशा कहते थे कि ब्रह्मचर्य किसी एक इन्द्रय का संयम नहीं है। ब्रह्मचर्य जीवन का संयम है। ब्रह्मचर्य का पालन उसी समय संभव है जबकि कान, आँख, जबान आदि सभी इन्द्रयों का संयम किया जाय।

ब्रह्मचर्य पालन करने की बात आजकल बहुत कठिन हो गई है। चारों ओर का वातावरण बड़ा दूषित हो गया है। सबके मन मानो खोखले हो गए हैं। सब जगह ढीलढाल और पोलपाल आ गई है। ब्रह्मचर्य आश्रम में मानो पुनर्जन्म है। अब संयमी होना चाहिए। ध्येय की उपासना करनी चाहिए। अग्नि में समिधा होम देने के बाद ब्रह्मचारी को जो प्रार्थना बोलनी चाहिए वह है- हे अग्नि मुझे बुद्धि, विचारशक्ति और तेज दे। इन्द्र मुझे बुद्धि, विचारशक्ति और सामथ्र्य दे। सूर्य मुझे बुद्धि, विचारशक्ति और तेज दे। हे अग्नि ! मुझे अपने तेज से तेजस्वा होने दे। अपने विजयी तेज स मुझे महान बनने दे। मलिनता को भस्म कर देने वाले अपने तेज से मुझे भी माल्नता का भस्म करने वाला बनने दे। मेखला और कौपीन धारण करके बटु हाथ में दण्ड लेता है। उस समय वह कहता है|मुझे असंयमी को यह दण्ड संयम सिखाए। हे दण्ड! जब कहीं मुझे डर लगे तब तू उससे मेरा उद्धार कर। उपनयन के अंत में जो मेधासूक्त बोलते हैं, संयमी ज्ञानवान गुरु इसे उन्नति की ओर ले जाए। यह तरुण अध्ययन करके, मन को एकाग्र करके देवताओं का प्यारा बने, तेजस्वी बने।
हम यज्ञोपवीत पहनते हैं। उसका पहले अर्थ कुछ भी रहा हो। मुझे तो उसके तीन धागों में एक बहुत बड़ा अर्थ दिखाई दिया। कर्म, भक्ति और ज्ञान के तीन धागे ही मानो यह जनेऊ है। इन तीनों को एकत्र करके लगाई हुई गाँठ ही ब्रह्मगाँठ है। जब हम कर्म, ज्ञान और भक्ति को एक दूसरे के साथ जोड़ेंगे, तभी ब्रह्म की गाँठ लग सकेगी। केवल कर्म से, केवल ज्ञान से, केवल भक्ति से ब्रह्मगाँठ नहीं लग सकेगी। पूल की पँखुड़ी, उसके रंग और उसके गंध में जिस प्रकार का एक ही भाव है, और जिस प्रकार दूध, शक्कर और केशर को हम एक कर लेते हैं उसी प्रकार कर्म, ज्ञान और भक्ति को भी एक बना लेना चाहिए। बीज तुच्छ है किन्तु वह जिस पेड़ का अंश है उसी स्तर तक विकसित होने की संभावनाएँ उसमें पूरी तरह विद्यमान हैं। बीज को अवसर मिले तो वह अपनी मूलसत्ता वृक्ष के समान फिर विकसित हो सकता है। जीवात्मा की प्रखरता बढ़ता रहे तो उसकी विकास प्रक्रिया उसे महात्मा-देवात्मा एवं परमात्मा बनन की स्थति तक पहुँचा सकती है। इन सब पर्वों, उत्सवों, संस्कारों एवं अन्य सामूहिक आयोजनों में यज्ञ का कार्यक्रम निश्चत रूप से जुड़ा रहता था, जिसका उल्लेख शास्त्रों में विभिन्न स्थानों पर किया गया है। यज्ञ के ज्ञान एवं विज्ञान के सिद्धांत की अवधारणा से ही स्वर्णिम परिस्थतियों का सृजन संभव हो सका था। जन्म के बाद जात कर्म, नामकरण, अन्नप्रशासन, मुण्डन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत आदि कई संस्कार हैं जो बचपन की आयु में जल्दी-जल्दी सम्पन्न किए जाते रहते हैं। इन सब में यज्ञ अनिवार्य है। इससे बालक को और उसके निरन्तर सम्पर्व में आने वाले मातापिता व रिश्तेदारों को साम्मलित होना पड़ता है। इससे शारीरिक एवं मानसिक विकृतियों के उत्पन्न होने की आशंका का पूर्व निराकरण हो जाता है। यज्ञ के द्वारा मनुष्य की आत्माग्न प्रदीप्त होती है। आत्मााQग्न के प्रदीप्त होने से परमात्मा प्रसन्न होते हैं और वह प्रसन्न होकर यज्ञकर्ता के समस्त मनोरथों को पूर्ण करते हैं (२/१४ शुक्ल यजुर्वेद) यज्ञ की अग्नि हविद्र्रव्य प्रदान करनेवाले को अत्यंत यशस्वी, ज्ञानी, विजयी और श्रेष्ठ वाग्मी (वक्ता) बनाती है और सर्वगुणसम्पन्न पुत्र प्रदान करती है (५/२५/५ ऋग्वेद)
ब्रह्मचारी बनने वालों को उस शास्त्र के अनुसार आचरण करना चाहिए। इसीलिए गाँधीजी हमेशा कहते थे कि ब्रह्मचर्य किसी एक इन्द्रिय का संयम नहीं है। ब्रह्मचर्य जीवन का संयम है। ब्रह्मचर्य का पालन उसी समय संभव है जबकि कान, आँख, जबान आदि सभी इन्द्रिय का संयम किया जाय। ब्रह्मचर्य पालन करने की बात आजकल बहुत कठिन हो गई है। चारों ओर का वातावरण बड़ा दूषित हो गया है। सबके मन मानो खोखले हो गए हैं। सब जगह ढीलढाल और पोलपाल आ गई है। ब्रह्मचर्य आश्रम में मानो पुनर्जन्म है। अब संयमी होना चाहिए। ध्येय की उपासना करनी चाहिए।
अग्नि में समिधा होम देने के बाद ब्रह्मचारी को जो प्रार्थना बोलनी चाहिए वह है- हे अग्नि मुझे बुद्धि, विचारशक्ति और तेज दे। इन्द्र मुझे बुद्धि,विचारशक्ति और सामथ्र्य दे। सूर्य मुझे बुद्धि, विचारशक्ति और तेज दे। हे अग्नि! मुझे अपने तेज से तेजस्वी होने दे। अपने विजयी तेज से मुझे महान बनने दे। मलिनता को भस्म कर देने वाले अपने तेज से मुझे भी मलिनता को भस्म करने वाला बनने दे। मेखला और कौपीन धारण करके बटु हाथ में दण्ड लेता है। उस समय वह कहता है- मुझे असंयमी को यह दण्ड संयम सिखाए। हे दण्ड! जब कहीं मुझे डर लगे तब तू उससे मेरा उद्धार कर। उपनयन के अंत में जो मेधासूक्त बोलते हैं, संयमी ज्ञानवान गुरु इसे उन्नति की ओर लेजाए। यह तरुण अध्ययन करके, मन को एकाग्र करके देवताओं का प्यारा बने, तेजस्वी बने

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दीपक / कलश और यज्ञ शेष

दीप और धूप यज्ञ दोनों ही भारतीय देव संस्कृति के प्राण हैं। दीपक प्रज्वलन देव पूजा का एक महत्वपूर्ण आधार है। देव पूजन में उसका सुनिश्चीत स्थान होता है। मंदिरों की सुबह-शाम की आरती में उसका अनिवार्य रूप से समावेश रहता है। दीपावली इस विद्या का वार्षिकोत्सव है। प्रत्येक धर्म-कर्म में दीपक जलाया जाता है। किसी खुशी के अवसर पर, समारोह शुभारंभ पर, उद्घाटन के अवसर पर अपने उल्लास-आनन्द को दीपक के द्वारा ही प्रकट किया जाता है।

घर में नित्य घी का दीपक जलाने से ऋणावेशित आयन्स की वृद्धि होती है। दरअसल घी का दीपक जलाने से घृत में उपस्थित विशिष्ट रसायनों का ऑक्सीकरण होता है। यही ऑक्सीकरण ऋणावेशित आयन्स अथवा घर की धनात्मक ऊर्जा में वृद्धि करता है। हमारे शास्त्रों में तो दीपक की लौ की दिशा के सम्बन्ध में भी पर्याप्त निर्देश मिलता है।

पुरातन वैज्ञानिक ऋषि सिद्धान्तों को अपनाएँ, हरियाली संवद्र्धन कर इस भूमि को हरीहर, हरी-भरी, हरीमय बनाएँ।

बचा चरू दिव्य प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। आहुतियों से बचा `इदत्रमम्’ के साथ टपकाया हुआ तथा वसोधरा से बचा घी घृतआवरण के रूप में मुख, सिर तथा हृदय आदि पर लगाया व सूंघा जाता है। होमीकृत औषधियों एवं अन्य हव्य पदार्थों से संस्कारित भस्म को मस्तक तथा हृदय पर धारण किया जाता है।

हवन के अन्त में समीप रखे हुए जल पात्र में कुश, दुर्वा या पुष्प डुबो-डुबोकर गायत्री मंत्र पढ़ते हुए रोगी पर उस जप का मार्जन करें, यज्ञ की भस्म रोगी के मस्तक, हृदय, कण्ठ, पेट, नाभि तथा दोनों भुजाओं से लगाएँ। इन सरल प्रयोगों को अनेक बार प्रयोग करके देखा गया है।

वस्तुत: अग्निहोत्र से धुआँ नहीं, ऊर्जा का प्रसारण होता है। ऊर्जा युक्त वायु हल्की होती है और हल्की वायु ऊपर को उठती है और नासिका द्वारा ग्रहण की जाती है। ऊर्जा में बढ़ा हुआ तापमान होता है वह त्वचा से स्पर्श करके रोम कूप खोलता है। स्वेद निकलता है और उस स्वेद के साथ ही रक्त तथा मांसपेशियों में जमे हुए रोग, वायरस, विजातीय तत्वों का निष्कासन होता है। इससे चर्म रोग मिटते हैं और बालों तथा त्वचा की जड़ों में जो अदृश्य कृमिकीटक होते हैं, वे समाप्त होते हैं, खाज, दाद, छाजन आदि भी ठीक हो जाते हैं। अग्निहोत्र ऊर्जा के साथ जुड़ी हुई उपयोगी शक्ति से रक्त में रोगनाशक शक्ति बढ़ती है। इसे जीवनी शक्ति का अभिवर्धन भी कह सकते हैं। इस आधार पर उस मूल कारण की समाप्ति होती है, जिससे भीतरी-बाहरी अंगों में शिथिलता छाई रहती है। आलस्य, भय, घबराहट, धड़कन, अपच जैसे रोगों में अग्निहोत्र लाभदायक होता है।

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रोंगो की हवन सामग्री

भारत में लोक परम्परा से संबंधित यह ज्ञान वैदिक समय (१०००-५००० बी.सी.) से देखा जा सकता है। हमारे वैदिक ग्रंथ, ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में ऐसे कई उदाहरण सामने आते हैं जिससे स्पष्ट होता है कि वैदिक समय में लोगों द्वारा वनस्पतियों का उपयोग चिकित्सा के रूप में हुआ करता था। ऋग्वेद में ६७, यजुर्वेद में ८१, आयुर्वेद में ७००, अथर्ववेद में २९०, सिद्ध पद्धति में ६०० तथा यूनानी पद्धति में ७०० औषधीय प्रजातियों का वर्णन मिलता है। चरक द्वारा ४३१ प्रजातियों का वर्णन तथा सुश्रुत द्वारा ३९५ प्रजातियों का वर्णन किया गया है।

मुनक्का से नजला, खाँसी को लाभ, सिर की थकान दूर होतीहै। शहद से नेत्र ज्योति बढ़ती है तथा कण्ठ शुद्ध होता है। घृत से बुद्धि तेजी होती है। नीम के सूखे पत्तों गिलोय व चिरायता से रक्तदाााव बन्द होता है। लाल चंदन से खाँसी भागती है। शंख वृक्ष के पुष्पों से हवन करने से कुष्ठ रोग चला जाता है। अपामार्ग बीजों से हवन करने पर मिर्गी (हिस्टिरिया) रोग शान्त होता है। तुलसी मलेरिया रोग को दूर करती है। श्वेत चन्दन का तेल सुजाक तथा आतशक रोगों का विष हरण करता है।

गूगल के गन्ध से मनुष्य को आक्रोश नहीं घेरता और रोग पीड़ित नहीं करते।

अपामार्ग, वूठ, पिप्पली, पृष्ठपर्णी, लाक्षा, शृंगी, पीपल, दूब,सोम, जौ की आहुतियाँ देने से भी अनेक रोग नष्ट होते हैं। अपामार्ग तो अनुवांशिक रोगों को भी नष्ट करता है |

भाव प्रकाश और अन्य आयुर्वेद ग्रंथों में यज्ञोपचार में प्रयुक्त होने वाली औषधियों की नामावली इस प्रकार है – मंडूपर्णी, ब्राह्मी, इन्द्रायण की जड़, सतावरी, असगन्ध, विधारा, शालपर्णी, मकोय, अडूसा, गुलाब के पूल, तगर, राशना, वंशलोचन, क्षीरकॉलोनी, जटामासी, पण्डरी, गोखरू, तालमखाना, बादाम, मनुक्का, जायफल, बड़ी इलायची, बड़ी हरड़, आँवला, छोटी पीपल, जीवन्ती, पुनर्नवा, नगेन्द्रवामड़ी, चीड़का बुरादा, गिलोय, चन्दन, कपूर, केसर, अगर, गूगल, पानड़ी, मोथा, चीता, पित्तपापड़ा। ये सब औषधियाँ समभाग, इनका दसवाँ भाग शक्कर तथा आठवाँ भाग शहद डालकर गोघृत में लड्डू समान बनाकर हवन में प्रयुक्त की जाती है।

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यज्ञ से वर्षा एवं कृषि वनस्पतियां

जर्मनी में वैज्ञानिकों द्वारा किए प्रयोगों से भी अब यह सिद्ध होगया है कि रोग कीटाणुओं को मारने की जितनी शक्ति इस ऊर्जा में है उतनी सरल, व्यापक और सस्ती पद्धति अभी तक नहीं खोजी जा सकी है। यज्ञ को प्राचीन काल में शारीरिक व्याधियों और मानसिक व्याधियों के शमन में सफलतापूर्वक प्रयुक्त किया जाता रहा है। आज अर्ध विक्षिप्तता-सनक, बुरी आदतें, अपराधी प्रवृत्तियाँ, उच्छृंखलता, आवेशग्रस्तता, अचिन्त्य चिन्तन, दुर्भावना जैसी मानसिक व्याधियाँ मनुष्य को कहीं अधिक दु:ख दे रही हैं और विपत्ति का कारण बन रही हैं। इसका निवारण यज्ञोपचार का सुव्यवस्थित रूप बन जाने पर भली प्रकार हो सकता है। वर्तमान यज्ञ प्रक्रिया जिस रूप में चल रही है वह भी किसी न किसी रूप में शारीरिक और मानसिक व्याधियों के समाधान में बहुत सहायक है। शारीरिक द्रष्टि से स्वस्थ तो कई व्यक्ति मिल सकते हैं परन्तु मानसिक द्रष्टि से जिन्हें संतुलित, विचारशील, सज्जन, शालीन कहा जा सके, कम ही मिलेंगे।

अन्तरिक्ष में जलीय गर्भ को धारण पोषण पुष्ट और प्रसव कराने में घृत सर्वाधिक समर्थ है। घृत के अतिरिक्त दूध, दही, आदि द्रव पदार्थ आद्र्र द्रव्य, स्नेहयुक्त हविद्रव्य, अन्नादि, वनस्पति इनका धूम मेघ निर्माण में तथा वर्षा कराने में परम सहायक हैं, यदि घृत के साथ इनका प्रयोग हो। घृत गौ का ही सर्वाधिक उपयोगी है। यदि एक सहस्र नारियल के गोलों में घृत, शक्कर, शहद, मेवा, खीर, मोहनभोग (हलुआ), मावा, तिल, जौ आदि पदार्थों को भरकर उनको यज्ञवेदी में अग्नि को अपनी वृष्टि की कामना के साथ समर्पित किया जावे और उच्च स्वर से ऊँ, स्वाहा-की सम्मिलित रूप से बार-बार ध्वनि की जावे तो वर्षा ऋतु में मेघों के होने पर उसी दिन शीघ्र ही वर्षा होगी। मेघ नहीं होंगे तो शीघ्र उत्पन्न होंगे और वर्षा भी उसी दिन १-२ दिन में होगी।

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धूप, यज्ञ, हवन, कंडा : रिसर्च, कंसल्टटेंसी

हम धूप, यज्ञ, हवन सामग्री पर कार्य करते है।

धूप यज्ञ हवन मैं हमें क्या दिखता है। अनुभव क्या होता है।

किसी उल्टे पिरामिड आकार के पात्र में या हवन कुण्ड में नीचे कुछ लकड़ियां जलाई जाती है। और उनके उपर वनस्पतियो को अर्पित किया जाता है। इससे बनने वाले वातावरण को हम अनुभव करते है। इससे हमारे आस पास का वातावरण शुद्ध हो जाता है।

यज्ञ हवन करते समय नीचे जलाया क्या जाए और उपर से डाला क्या जाए। इसी विषय पर हमारे द्वारा कार्य किया जाता है।

इस क्रिया से स्वास्थ प्रद, सुगंदित, प्रगतिशील तॆज युक्त वातावरण उत्तपन्न हो हमारे आस पास के वायरस किटाणु फंगस नस्ट हो और हमारा इम्यून सिस्टम स्ट्रांग हो इस प्रकार की व्यवस्था धूप, यज्ञ, हवन से ही उचित है। इसमें उपयोग आने वाली सामग्री क्या हो, क्यों हो और उसे उपयोग कैसे किया जाये इसी विषय पर हमारे द्वारा काम किया जाता है।
उपयोग का उचित समय संधिकाल होता है , उस समय वायरस कीटाणु ज्यादा उग्र होते है , सुबह 6 से 7 एवं शाम 5 से 7 उचित संधि समय होता है।

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गौरीश प्रोडक्ट्स की सामग्री निम्न लिस्ट मे से ली गयी है। जिनमे औषधीय एवं प्रकृति सुगंध युक्त जड़ीबूटियों का अद्भुत संगम है।

List of Herbs


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Image Sanskrit Name Hindi Name Latin Name
1आकल्लकःअकलकराPellitory Root
2फलस्नेहअखरोटJuglans Regia
3अगस्त्यअगिसत्याAgati Grandiflora
4अगुरअगरAquilaria Agallocha
5निकोचकः रेचीअकोल डेराAlangium Lamarckii
6द्राक्षा मधुरसाअंगूरYitis Viniferr
7अंजनवृक्षअंजनीMemedylon Ebule
8यवनी दीप्यकअजवायनCarum Copticum
9पारसिक यमानीअजवायन खुरासानीHyosyamus Niger
10काकोदुम्बरिका मञ्जुलअंजीरFica Carica
11वासक आटारुषअडूसाAdhatoda Vasica
12जत्यमल्पर्णीअत्यामल्पर्णीVItis Camosa
13अतिबलाअतिबलाAbutila Indicum
14भंगुरा अतिविषाअतीसAconitum Haterophylum
15आदर्शकअदरकZingiber Officinale
16मलांदअंतमूलTylophora Asthmatica
17दाड़िमअनारPunica Granatum
18उतपलसारिवाअनन्तमूलHemi Desmus Ludicus
19विष्णुक्रांताअपराजिताClitoria Ternotia
20अपामार्गअपामार्गAchyranthus Aspera
21अहिफेनअफीमOpium
22नुपद्रमः हेमपुष्पअमलतासClassia Fistuin
23अगनिजारअम्बरAmber Gris
24अरण्यतम्बाकूअरण्यतम्बाकूVerbascum Thapsus
25अर्जकअरण्यतुलसीOcimum Gratissimum
26अग्निमन्यःअरनीPremna Integrifolia
27अरलूअरलूOroxylum Indicum
28अर्जुनअर्जुनTerminalia Arjuna
29अलियारअलियारDodonaea Viscosa
30अशोकअशोकSaraca Indica
31असंगधअसंगधWithania Somnnifera
32चन्द्रसूपमअसलुLepidum Sativum
33अर्कआकCalotropis Gigantica
34आबनूसआबनूसDiospyros Ebinoster
35आम्रहरिदाआम्बीहल्दीCurcuma Aromatica
36आमआमMangifera Indica
37अम्बुजआम्रगंधकLimnophila Gratioloides
38विशल्यकर्णीआयापानEupatorium Ayapan
39मत्स्यगंधाआरारJuniperus Cummunis
40पंचरसाआँवलाPhyllanthus Embelica
41आशफलआशफलNephelium Longana
42आसआसMyrtus Commnuis
43कुतजबीजइन्द्र्जोHolorrhana Antidysenterica
44आत्मरक्षइन्द्रायणCitrullus Colocynthis
45श्वेतपुष्पीइंद्रायन लालTrichosanthes Palmata
46अहिगन्धइसरमूलAristolochia Indica
47इरसाइरसाIris Veris Color
48अफीमुनसउफ़ीमुनसAgrimonia Eupatorium
49कणटफलःऊटकटाराEchinops Echinatus
50प्राणप्रियाऋद्धि
51महिविरएकवीर
52कुकुरदु ताम्रचूड़ःककरोंदाBlumea Lacera
53ककोटकीककोड़ाMomordica Dioica
54प्रियंगुकंगुनीSeteria Italica
55चिरचिटाकंगूLycium Barbarum
56ज्योतिष्मतीकँगुलीCelastrus Parmicalta
57कांचनकचनारBauhinia Tancatosa
58कर्चरकचूरCurcuma Zedoaria
59वृक्ष मरीचकञ्जToddalia Aculeata
60कुरंटककटसरैयाBarleria Prioniatis
61पनसकटहलArtocarpus Integrfolia
62विकंकतकनटाईFlacourtia Rawontchi
63बृहतिकटेरीSolanum Indicom
64कंटकारीकरेरी छोटीSolanumxanthocarpum
65गरुड़फलकड़वी कोठHydnocarpus Wightiana
66अमृतफलाकड़वी परवलTrichosanthes Cucumerina
67श्वेतकुष्मांडकद्दू सफेदBenincasa Cerifera
68कदम्बकदम्बAnthocephalus Cadmaba
69कर्णीकारकनक चम्पा
70करवीरकनेरNerium Odorum
71कर्पूरकपूरCamphora Officinarum
72गन्धमलिकाकपूर कचरीHedychium Spicatum
73कंकलकमकबाब चीनीPiper Cubeba Cubeba Officinalis
74काश्मीरकंभरीGmelia Arborca
75कमरकसकमरकसSaivia Plebeia
76नीलकंठकुरुGentiana Kuroo
77करमर्दिकाकरोंदीCarissa Spinarum
78कपोत पदीकलंव की जड़Jateorhisa Palmata
79अग्निशिखाकलिहारीGlorieosa Superba
80स्थूलजिरकक्लोजीNigella Sativa
81मृगनाथकस्तूरीMoschus Moschiferus
82लताकस्तूरी दानाHibiscus Abelmuoschus
83कासमर्दकसोदीCassia Occidentalis
84कंकुष्ठकंकुष्ठGarcinia Hanburi
85कर्कटशृंगीकाकड़सिंधीPistacia Integerrima
86काकतुण्डिकाकतुंडीAsclepias Curssaviea
87आकरीकाकनजWithania Congulans
88कंकोलीकंकोलीLuvanga Scadens
89कंगनिकाकंगनीSetaria Italica
90कारीकारीClcrodendron Infortunatum
91कालीनगदतागयमनीArtemisia Vulgaris
92बनजीरकःकालीजीरीVernonia Anthelmintica
93कालमेघकालमेघAndrographis Paniculata
94भृगड़ीकीड़ामारीAristolochia Bactiata
95चित्रांगीकुटकीPicrorrhiza Kurrooa
96कुंकुमकेशरGrocus Sativus
97श्वेत खदिरकुम्हटियाAlpinia Galanga
98हरीभद्रककूटSaussurea Lappa
99किलकेलPinus Excelsa
100अम्लवीयकोकमCarcinia Indica
101निवालीकोट गन्धलIxora Parviflora
102खतमीखतमी
103खपराधानपत्रा
104खरैंटीबलाSide Cordifiolia
105मधुपिलुखरजलSalvadora Persica
106हरिप्रियाखसAndropog on musicatus
107लामज्जकखावीAndropogon Iwarancusa
108खदिरखैरAcaeia Catechu
109नागबलागंगेरनSide Spinosa
110गज पीपलचव्यफलScindepus Officianelis
111कूत्रणगंजनीAndropogon Nardus
112प्रसारिणीगन्ध प्रसारिणीPaedria Foetida
113गोरिबीजगन्धकSulpher
114हेमन्तहरितगन्धपूर्णGaultheria Fragrantissima
115गरबगरब
116अजयगांजा व् भांगCannabis Sativa
117गुडुचीगिलोयTinospora Cordifolia
118जवागुड़हलHibiscus Rosasinensis
119अजगन्धिनीगुड़ मारGymnema Sylvestris
120गुग्गुलगूगलBalsamodendron Mukul
121गूगल धुपगूगल धुपAilanthus Malbarica
122बिन्दुफलगुंथीCordia Rothi
123द्रोणपुष्पीगुमाLeucas Cephalotus
124जन्तुफलगूलरFicus Glomerata
125बहुकंटकागोखगु छोटाTribuls Terrestris
126गोक्षुरगोखगु बड़ाPedalium Murex
127चित्रलागोरख इमलीAdansonia Digitara
128अरुणागोरखमुण्डीSpheranthus Indicus
129जीवंतीगोलTrema Orientalis
130गोरोचनगोरोचनBostanrus
131कचनाचम्पाMichelia Champaca
132पीला चम्पाचम्पा पीलाMichelia Nilagirica
133राजपुत्रीचमेलीJasminum Grandifloram
134अश्वकर्णचन्दरसVateria Indica
135छविकाचव्यPiper Chaba
136चवरीचापराMyesine Africana
137कुष्ठबैरीचाल मोगराTaractongenos Kursii
138चिरतिक्ताचिरायताSwertia Chirata
139चिरायता पहाड़ीचिरायता मीठाSwertia Augusfufolia
140बड़ा चिरायताचिरायता बड़ाExacum Bicolor
141झिरपटचिरियारीTriumfetta Rotundifolia
142प्रियालचिरोंजीBuchanania Latifolia
143सप्तचक्राचिल्लाCasearia Esculenta
144भद्रदारूचीड़Piinus Longifolia
145अमृतोपहिताचिबचीनीSmilax China
146लोहकष्ठचौबे हयातGuaiacom Oficinalis
147पाताल गरुडीचिरेटाCocculus Villous
148शमीछोंकरSpunge Tree
149अर्क पुष्पीछिरवेलHolostemma Rheedii
150सप्तपर्णछतिवनDita Bark
151चन्दनछोटा चाँदRauwolfia Serpentina
152हेमसागरजरुमेहयातBryophyllum Calycinum
153जंगली बादामजंगली बादामSterculia Foetide
154जंगली अखरोटजंगली अखरोटAcurites Moluceana
155अरण्य सुरणजंगली सुरणAmorphophallus
156बन हरिद्राजगली हल्दीCurcuma Aroatica
157कामुकजगली जायफलMyristica Malabarica
158जटामांसीजटामांसीNarbostachys Jatamansi
159निविर्षाःजदवारDelphinium Denudetum
160जमराशिजमरासीElaeodendron Glaucum
161बहुकन्दजमीकन्दAmorphophallus Campanlatus
162जरायुप्रियाजरायुप्रियाErigeron Canadensis
163वैकुण्डचौधाराMalabar Catumind
164शेलाख्यछरीलाParmelia Perforata
165जलकेशरजलकेशर
166शार्दीजल पिप्पलीLippia Nodiflora
167अधिकंटकजवासाAlhagi Mawrorum
168यास सर्करा तुरंजबीनायास सर्करा तुरंजबीना
169जायफलजातीफलMyristica Fragrans
170जायपत्रीजातीपत्रीThe Aril Myristica Fragrans
171जैतूनजैतूनOlea Europea
172यवजौHordecum Vnlgar
173पुत्रजीवाजियापोताPutranjiva Roxburghii
174जिंगनीजिंगनOdina Wodeir
175मत्कुणारीजिऊंतीCimicifuga Felida
176जीवतिजीवन्तिSarcostemmma Breistigma
177जीवन्तिजीवतिDosmotrichum Fimbriatum
178यूथिकाजूहीJasminum Aurilculatum
179भूबदरीझड़बेरZizyphus Nummularia
180झाऊकाझाऊTamarix Gallica
181अश्मन्तकःझिंझोरीBauhinia Racemosa
182नदिहिंगुडिकामारीGaadenia Cummifera
183घंटाबीणाडिजिटेलिसDigitalis Purpuria
184पलाशढाकButea Frondosa
185नततगरValeriana Waliehii
186तजतज़Cinnamomum Cassia
187आवर्तकीतरवड़Cassia Auriculata
188यवजतवखीरCurcuma Angustifolia
189नागवल्लीताम्बूलPiper Betel
190कोकिलाषतालमखानाAsteracantha Longifolia
191तालीसपत्रतालीसपत्रTaxas Baccatta
192सूभद्राणीत्रायमाणDelphinium Zaleri
193अतिमुक्तकतिन्दुDiospyres Embryopteris
194अक्षकातिनिशOugenia Oobjeinensis
195तिलतिलSesamum Indicum
196तिलकतिलक
197तुलसीतुलसीOcumum Sanctum
198अजगन्धिकातुलसी बुबईOcumum Basilicum
199अर्जकातलसी उजर्कीOcimum Canum
200तुंबरूतुंबरूZenthoxylum
201यवासतुरंजबीन
202तृननकतुनCedrela Toona
203तेजस्विनीतेजबलZanthoxylum Hostile
204तमालतत्रातेजपातCinnamomum Tamala
205टेलीकंदतेलिया कन्द
206तोदरी सुर्खतोदरी सुर्खCheiranthus Cheiri
207बहुदुग्धिकाथूहर नागफनीOpuntia Dilenaii
208ददूधनदाद मर्दनCassia Alata
209दारूनिशादारू हल्दीBerberis Aristata
210दारूहल्दी का फलदारूहल्दी का फल
211वल्लीहरिददारूहल्दी मलाबारीCoscinium Fenestrutum
212बहुगन्धादालचीनीCinnamomu Zyeylanicum
213दूधिया लतादूधिया लताOxystelma Esculeutum
214कृष्णसारिवादूधीकालीIchnocarpus Frutescens
215बहुवीर्यदुबCynodon Dactylon
216देवकाषठदेवदारुPinus Deodara
217अग्निदमनकदौनाArtemisia Sieuersiana
218सुवर्णक्षीरीधतूरा पीलाArgemone Mexicana
219पद्दमुखीघमासाFagonia Arabica
220धवधवAnogeissus Latifolia
221अग्निज्वालाधायWoodfordia Floribunda
222कचछरूहानागरमोथाCyprus Scarious
223नागदमीनागदमनीCrinum Asiaticum
224भुजागाखयनागकेसरMesua Ferrea
225नारिकेलनारियलCocos Nucifera
226कटकमनिर्मलीStrychnos Potatorum
227इन्द्राणीनिर्गुण्डी इन्द्राणीVitex Negundo
228निमुर्डीनिमुर्डीBlumea Eriantha
229निविर्षिनिविर्षिKyllingia Trileps
230निम्बनीमAzadirachta Indiacat
231केडयेनीम मीठाMurraya Koenigii
232अमलकेशरनीबू बिजोराCitrus Midica
233नीलोफरनीलोफर
234नील निर्गुण्डीनील निर्गुण्डीJysticia Gendarussa
235नील चम्पकनील चम्पकArtabotrays Odoratissimus
236निसोमलीनिसोमलीPolygonum Aviculare
237नुलनुलChukrasis Tabularis
238नुका चीनीनुकाचीनीStemodia Viscosa
239बाला सुगंधवालानेत्रवालाPavonia Odorata
240पदमाकपदमाकPrunus Puddum
241भार्यापृक्षपतंगCaesalponia Sappan
242यवासतुरंजबीन
243पर्वतीपर्वतीCocculus Pendulus
244नागतुम्बीपाताल तुम्बीBovista Spisis
245पाटलापाडलStroeospermum Tetrangonum
246अलिप्रियापाडरSteleopermum Suabeolens
247पाषाणभेदीपाखाण भेद
248पाचीपानडी
249फणीजजकपांगलाPogostamon Parvilorus
250परिभद्रपांगराErythrina Indica
251चारुदर्शिनीपाकरFicus Iacor
252गोलिमिकापाथरीLaunaea
253पर्पटीपापरीLxora Paniculata
254प्रचीनामलकपानी आँवलाElacourtia Cataphracta
255पंज कश्तपंज कश्त
256राजारानीपजमुन्नी पालाAlstonia Venenatus
257परजम्बपरजम्बOlea Diocia
258बहूप्रजाजुलीPhyllanthus Reticulatus
259नन्दीवृक्षप्ररोहीTabernaemotana Coronaria
260प्लक्षपाकरिFicus Tiseila
261इन्द्राणीकापानी की संभालुVitex Trifolia
262कंदरालपारस पीपलThespesia Populcea
263प्रजापतपरिजातNyctanthes Arbortristis
264पारुपारुAllium Porrum
265पिंडीतकपिंडालूRandia Ulignosa
266प्रियंगुप्रियंगुAgalia Odoratissima
267पिंडारपिंडारTrewia Nudiflora
268पीतकपियारङ्गThalictrum Poliologum
269पृशिनपर्णीपिठवनUraria Lagopoides
270चित्रपर्णीपिठवनUraria Picta
271पर्पटपित्तपापड़ाFumaria Parviflora
272पिलोपिलिआगियोCistanche Tubulaosal
273धानीपीलूSalvadora Oleoides
274सुवर्ण कर्पासपिली कपासCochlospermum Gossypium
275अश्वतथपीपलFicus Religiosa
276पिप्पलीपीपरPiper
277पुङ्गमथेङ्गपुङ्गमथेङ्गBlumea Densiflora
278श्रीपुष्पपुण्डरीक
279पुत्रदन्तीपुत्रदन्ती
280पुन्नागपुन्नागCalophyllum Inoghyllum
281पुनर्नवापुनर्नवाBoerhevia Diffusa
282पुलीचनपुलीचनUvaria Narum
283पेनालीवल्लीपेनालीवल्ली
284कानकखीरपेरुPlumieria Alba
285पुष्करमूलपोकर मूलCostus Speciosus
286पोटवेटपोटवेटPothos Candens
287पोदीना पहाड़ीपहाड़ी पोदीनाMentha Varidis
288उपोदिकापोईBasella Rubra
289फंजीयुनफंजीयुनTussilago Farfara
290फंजीकाफांडRivea Ornata
291बड़बड़Ficus Bengalensis
292नीलपुष्पबनफशाViola
293बचीबचAcoras Clammus
294विभीतकबहेड़ाTerminalia Belerica
295स्वर्णबंदाViscum Album
296बांदाबंदाLoranthus Longiflorus
297बादामबादामPrunus Amygdalus
298भूलवंगबनलोंगJussieua Suffruticosa
299बादाम बर्बटीबादाम बर्बटीCanarium Commune
300बसन्तीबसन्ती
301वंशलोचनवंशलोचनBambuna Arundinacea
302भ्रंगराजभांगराEclipta Prostrata
303अंगारवललरीभारंगीClerodandron Serratum
304काकमाचीमकोयSolanum Nigrum
305पदम्मखानाEuryale Ferox
306समंगामजीठRubia Cordifolia
307मधुमधुMel
308रक्तरोहिड़ारोहिताShorea Robusta
309नाकुनिरासनाVanda Roxburghii
310महाभीतिकालजालूMimosa Pudica
311लक्ष्मणालक्ष्मणाIpomaea Sepiaria
312शैलूलसोड़ा छोटाCordia Obliqus
313वनमल्लिकावनमल्लिकाJasminum Rotlerianum
314शतावरीशतावरीA. Sarmentosus
315ब्रम्हकाष्ठशहतुतMorus Indica
316शालपर्णीशालपर्णीDesmodium Gangeticum
317ईश्वरीशिवलिंगाBryonia Iaciniosa
318यवतिक्तासंखिनीGanscora
319समुद्रयूथिकासंगकुप्पीClerodendron Inerme
320हलियुनहलियुनAsparagus Officinalis
321हरीतकीहरड़Terminalis Chebula
322हरिद्राहल्दीCurcuma Longa
323हंसराजहंसराजAdantium Capallis
324हिंगुहींगFerulo Narthex
325बोलहिरबोलBalsamodendron Myrrha
326क्षीरकाकोलीक्षीरकाकोली
Hawan

यज्ञ विज्ञान

संन्यासाश्रम में प्रवेश करने से पूर्व उसका यज्ञोपवीत उतार लिया जाता है जो यह दर्शाता है कि भविष्य में वह संन्यासी सब प्रकार के कर्मकाण्डों से मुक्त है| संन्यासी का मुख्य कर्तव्य है कि वह समाज के सभी वर्गों में नियमितरुप से वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार करता रहे तथा किसी भी प्रकार की राजनीति में न पड़े| एक सच्चा संन्यासी वैसे भी भौतिक सुख-सुविधाओं को त्याग कर ही संन्यासी बनता है| अतः वह धार्मिक क्षेत्र में ही अपना अमूल्य जीवन बिताने की प्रतिज्ञा लेता है| वह सांसारिक प्रपंचों से मुक्त हो जाता है| संक्षेप में एक संन्यासी तीनों ऐषणाओं से ऊपर होता है| एक संन्यासी को भौतिक नश्वर वस्तुओं में राग (आकर्षण) नहीं होता क्योंकि उसका बस एक ही लक्ष्य होता है मुक्ति प्राप्त करना, ईश्वर के सान्निध्य में रहकर आनन्द प्राप्त करना|

शतपथब्राह्मण में लिखा है-ब्रह्मा, होता, अर्ध्वयु तथा उद्गाता पश्चिम (भौतिक संसार) की ओर चलते है अर्थात् संन्यासी पूर्व (अभौतिक मोक्ष) की ओर चलता है अर्थात् संन्यासी का मार्ग दूसरों से भिन्न होता है| संसारी लोग भौतिक वस्तुओं की ओर भागते हैं परन्तु एक सच्चा संन्यासी पारलौकिक आनन्द की खोज में रहता है| यहाँ स्पष्ट है की संन्यासी और अन्य लोगों के कर्तव्य/उद्धेश्य भिन्न-भिन्न होते हैं| कात्यायनसूत्र (१.२.४) में लिखा है ‘सर्वेंषा-यज्ञोपवीत्योदकाचमते नित्येकर्मोपयाताम्’ अर्थात् यज्ञ के ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु और उद्गाता इत्यादि को अनिवार्यरूप से यज्ञ प्रारम्भ से पूर्व यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये और तीन ‘आचमन’ (जल के तीन बार घूँट पीने की क्रिया) करनी चाहिये| ‘ यज्ञ के ब्रह्मा के लिये यज्ञाग्नि में अपनी आहुति प्रदान करने का विधान है’(गोपथब्राह्मण)| बलिवैश्वदेव-यज्ञ की १६ आहुतियाँ होती हैं, उनमें से 10 आहुतियाँ चूल्हे से अग्नि अलग धर के उसमें बलिवैश्वदेव-यज्ञ किया जावे| शेष ६ भाग किसी दुःखी बुभुक्षित प्राणी अथवा कुत्ते आदि को दे देवें| (स. प्र.) यहाँ कुत्ता, कौवा, चींटी आदि प्रतीक मात्र हैं, वास्तव में परमात्मा के बनाये समस्त प्राणी किसी न किसी रूप में मनुष्यों के लिये हितकारी होते हैं| अतः जहाँ तक हो सके उनकी रक्षा करना मनुष्य का कर्तव्य है और उनकी बिना कारण हिंसा करना पाप है| “कुत्तों, कंगालों, कुष्टी आदि रोगियों, काक आदि पक्षियों और चींटी आदि कृमियों के लिये छः भाग अलग-अलग बाँट के दे देना और उनकी प्रसन्नता करना| अर्थात् सब प्राणियों को मनुष्य से सुख होना चाहिये|” वर्तमान में भारत में ही नहीं, विदेशों में भी ‘महायज्ञ’ के नाम से अनेक यज्ञों का आयोजन पूर्ण श्रध्दा और प्रेम से किया जाता है| निश्चित रूप से यह एक शुभ संकेत है कि इस पृथ्वी पर रहने वाले अधिक से अधिक लोग वैदिक धर्म (मानव-धर्म) और वैदिक सिध्दान्तों की ओर आकर्षित होकर अपना रहे हैं| धार्मिक सज्जन अवश्य जान लें कि वैदिक मान्यतानुसार महायज्ञ पाँच ही होते हैं| यज्ञ के तीन प्रधान अंग हैं संकल्प, मन्त्र और आहुति| संकल्प के बिना यज्ञ नहीं हो सकता, मंत्रोच्चारण बिना यज्ञ नहीं हो सकता और यज्ञाग्नि में आहुतियाँ प्रदान किये बिना भी यज्ञ (हवन/अग्निहोत्र) पूर्ण नहीं हो सकता| इन तीनों का समन्वित कार्य ही यज्ञ कहाता है| यजमान का आसन यज्ञकुंड के पश्चिम (मुख पूर्व) में होता है और उसकी धर्मपत्नी उसके दाहिनी ओर बैठती है| यजमान को ‘याजक’ और उसकी धर्मपत्नी को ‘यज्वा’ कहते हैं| वर्तमान में हम देखते हैं कि यज्ञकुंड के चारों ओर यग्यप्रेमी दम्पति बैठते हैं वे अतिथि या दर्शक होते हैं, यजमान नहीं| रही बात चारों कोनों में बैठे बारी-बारी से आहुतियाँ देने की, तो यह अवैदिक है| यज्ञाग्नि में गोघृत तथा सामग्री (विभिन्न प्रकार के सुगन्धित पदार्थ तथा औषध गुणों से भरपूर जड़ी-बूटियों का मिश्रण) की आहुतियों से निकलने वाली सूक्ष्म गंध वायु को शुध्द करती है और यह वायु देश-विदेश में जाकर सब प्राणधारी (जीवों) को स्वास्थ्य लाभ पहुँचाती है|

यह सर्वश्रेष्ट परोपकारी कार्य है क्योंकि इससे अपने हों या पराये, मित्र हों या शत्रु सबको लाभ पहुँचता है| सब प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोग दूर होते है| यज्ञाग्नि से उठने वाले धुएँ से पेड़-पौधों तथा वृक्षों में भरपूर खुराक मिलती है| यज्ञाग्नि में आहूत पदार्थ (घृत और सामग्री) सूक्ष्म होकर वायु द्वारा आकाश में भेदन शक्ति उत्पन्न करके वर्षा करते हैं और वही पदार्थ वर्षा के जल द्वारा भूमि को प्राप्त होते हैं, जिससे फसल (उपज) अधिक और पौष्टिक होती है| यज्ञ से यजमान तथा यज्ञ में भाग लेने वाले अतिथियों के मन में नकारात्मक विचार समाप्त होते हैं तथा उनमें सकारात्मक विचार उत्पन्न होने लगते हैं| यजमान का आसन यजमान के लिये सुरक्षित होता है और उसके दाहिनी ओर उसकी धर्मपत्नी बैठती है और यदि यजमान उसका (पुरुष या स्त्री) अकेला/अकेली है तो उसके साथ में उसका भाई, मित्र या रिश्तेदार बैठ सकता है| स्मरण रहे कि पुरुष के दाहिनी ओर केवल उसकी धर्मपत्नी ही बैठ सकती है, अन्य कोई स्त्री (बहन, भाभी, माँ) नहीं|अन्य आसनों पर भी ऐसा ही समझना चाहिये| बहन, भाभी या अन्य कोई को पुरुष के बाईं ओर ही बैठना उचित है, ऐसा आर्ष ग्रंथों में वर्णित है| वैदिक संस्कारो में ऐसा ही विधान है| जो बात सत्य (वेदोक्त) है उसको वैसा जानना,मानना और व्यवहार में लाना ही सही मायनों में सत्य कहता है| कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो स्वाध्याय नहीं करते और केवल ‘अहम्’ को प्रसन्न करने हेतु या दूसरों पर जमाने हेतु आर्ष ग्रंथों की प्रामाणिक बातों को नहीं मानते और बेतुके तर्क और छल से अपनी बात को ही ठीक समझते हैं, ऐसे लोग स्वयं तो डूबते ही हैं दूसरों को भी अज्ञानता की गहरी खाई में धकेलते हैं| यह घोर अपराध है| यह अहंकार/अभिमान/स्वार्थ का प्रतिक है तथा लोकैषणा को दर्शाता है| समय पर पधारने वाले अतिथियों का सम्मान अवश्य करना चाहिये| यज्ञ की विधि प्रारम्भ होने के पश्चात् आने वाले व्यक्ति को भी योग्य है कि वह चुप-चाप आकर शान्ति से जहाँ रिक्त स्थान दिखाई दे वहाँ बैठ जाए| किसी को इशारे से भी नमस्ते न करे| जिसे हम परोपकार की भावना से यज्ञ में शामिल हुए हैं, दत्तचित्त होकर अपना पूरा ध्यान उसी में लगाएँ| याद रहे की मन एक समय में केवल एक ही काम करता है और वह अत्यन्त चंचल होने के कारण बहुत विचलित हो जाता है तथा दोबारा नियन्त्रित करना कठिन होता है|

हमें अपने अतिथियों से या सगे-संबंधियों से मिलने के अनेक अवसर मिलते हैं, यज्ञ के बीच में उनको नमस्ते करना या मुस्कराहट देना, इससे यह प्रतीत होता है कि आप यज्ञ वेदी पर मात्र दिखावे के लिये बैठे हैं| अथर्ववेद (१.7.६ से मन्त्र सं० 19 तक) में अनेक यज्ञों का वर्णन आया है और चारों वेदों के २०३७६ मंत्रों में से एक भी ऐसा मंत्र नहीं है जिससे बहुकुंडीय यज्ञ करने का विधान प्रमाणित होता हो| वैदिक धर्म (मिमान्सादर्शन के अनुसार) में पाँच प्रकार की अग्नियों का वर्णन आया है| १. गार्हपत्य, २. आहवनीय, ३. दक्षिण (श्रौत अग्नियाँ), ४. सभ्या और ५. वसथ्य| श्रौत यज्ञ में पाँच अग्नियों के पाँच यज्ञकुंड होते हैं परन्तु इनमें भी मुख्य आहवनीय कुण्ड एक ही होता है जिसमें आहुतियाँ दी जाती है शेष चार कुण्ड यज्ञादि कर्मकांड पूर्ण करने के लिये होते हैं| लोगो ने इसे बहुकुंडीय यज्ञ समझ लिया है जो अवैदिक, अवैज्ञानिक, अशास्त्रीय तथा एक प्रकार का पाखण्ड है जो मात्र स्वार्थपूर्ति का एक जरिया है| बहुकुंडीय यज्ञो का समर्थन करना अशिक्षा, अस्वाध्याय तथा ऐषणाओ में लिप्तता का परिणाम है| किसी विशेष अवसर पर यज्ञ के मुख्य यजमानों की संख्या बहुत अधिक है और सब यजमान बनना चाहते है तो ऐसी परिस्थति में बहु-कुण्डीय यज्ञ का आयोजन करने-कराने में कोई त्रुटी न हो परन्तु ऐसा सम्भव नहीं हो सकता क्योंकि ब्रह्मा एक और यजमान अनेक| एक ब्रह्मा सर्वव्यापक नहीं हो सकता जो सब ओर ध्यान दे पावे| अतः यज्ञ में गलती होने से लाभ के स्थान पर हानि ही होती है| यज्ञ के ब्रह्मा को पूरा उत्तरदायित्व निभाना पड़ेगा कि यज्ञकर्म में किसी भी यजमान से यज्ञ के अंतर्गत कोई त्रुटी न हो और यह एक ब्रह्मा के लिये सम्भव नहीं है| देश-काल-परिस्थिति को ध्यान में रखकर यदि बहुकुंडीय यज्ञो का आयोजन करना पड़े तो सब कुंडों के पास सुशिक्षित यज्ञ मार्गदर्शक उपस्थित होने चाहियें, जो समय-समय पर नये आमंत्रित यजमानों को ठीक तरह से यज्ञ की विधियाँ समझा सकें, जिससे नये यजमानों की यज्ञ के प्रति आस्था बनी रहे और यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हो सके परन्तु सर्वविदित प्रत्यक्ष प्रमाण है कि ऐसा होना सम्भव नहीं है| मैंने ऐसे अनेक यज्ञो में भाग लिया है और खेद के साथ लिखना/कहना पड़ता है कि इस प्रकार के बहुकुंडीय यज्ञों में अनेक बार धुआँ होता है, सब यज्ञकुण्डों पर घी तथा सामग्री की व्यवस्था में विलम्ब होता है और यज्ञ प्रक्रिया को अनेक बार कुछ समय इतना होने के बाद भी घोषणा की जाती है कि ‘ईश्वर की असीम कृपा से यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हुआ|’ यज्ञ के ब्रह्मा के द्वारा यह सरासर अधर्म है|

यज्ञ करना सर्वश्रेष्ट केम और धर्म है परन्तु जिस बात की चर्चा (बहुकुंडीय यज्ञो की चर्चा) यदि हमारे आर्ष ग्रंथों में नहीं है तो हमें उस वाद-विवाद में नहीं पड़ना चाहिये| जिन लोगो को बहुकुंडीय यज्ञ करना अच्छा लगता है, क्योंकि उससे उनकी प्रसिध्दि होती है तथा ब्रह्मा को भी अधिक मात्र में दान-दक्षिणा मिलती है तो कोई क्या कर सकता है! आजकल लोगो का झुकाव धर्म से अधिक धन की ओर बढ़ रहा है क्योंकि उन्हें लक्ष्य नहीं लक्ष्मी चाहिये| अपनी-अपनी समझ है| वैदिक यज्ञ में बहुकुंडीय यज्ञ नहीं होता और जहाँ होता है वहाँ अवैदिक एवं गलत ढंग से होता है| हमारे ऋषियों ने कहीं भी बहुकुंडीय यज्ञो का विधान नहीं बताया है| अतः बहुकुंडीय यज्ञों का निषेध करना चाहिये| सत्य के साथ कभी समझौता नहीं करना चाहिये| बहुकुंडीय यज्ञ हर द्रष्टिकोण से अवैदिक एवं अवैज्ञानिक है अतः उसका बहिष्कार अवश्य करना चाहिये| यज्ञकर्म की परिधि ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ तक ही सीमित है अर्थात् सन्यासाश्रम में नहीं| गृहस्थी ब्राह्मण अर्थात् जो वैदिक विद्वान गृहस्थ में रहता है, वही सभी वैदिक संस्कारों को (पुरोहित के कार्यो को) करा सकता है| ब्रह्मचारी और वानप्रस्थ स्वयं यज्ञ कर सकते हैं| परन्तु दूसरो के यहाँ पुरोहित बनकर नहीं करा सकते | दूसरी ओर एक सन्यासी न स्वयं यज्ञ कर सकता है न ही दूसरो के लिये यज्ञ कर्म करा सकता है| केवल गृहस्थी पुरोहित ही दूसरों के लिये यज्ञकर्म करा सकता है| सन्यासाश्रम को उच्चकोटि का आश्रम मन जाता है क्योंकि स्वर्ग की कामना करने वाले लोग तीन आश्रमों (ब्रह्मचर्य,गृहस्थ और वानप्रस्थ) में रहते हैं अतः कहते है कि स्वर्ग की कामना करने वाले लोग यज्ञ किया करें| वैदिक धर्म में सन्यासी को यज्ञ अर्थात् कर्मकांड न करने की पूरी छुट प्राप्त है क्योंकि यज्ञ भी एक प्रकार का कर्मकांड ही है और वैसे भी सन्यासाश्रम में प्रवेश करने से पूर्व, सन्यासाश्रम की दीक्षा ग्रहण करते समय, उनका धारण किया हुआ यज्ञोपवीत उतार दिया जाता है अर्थात् इसके बाद वह सन्यासी भविष्य में यज्ञकर्म करने से पूर्णरूपेण मुक्त है| दूसरे अर्थों में यज्ञ करने का आदिकर मात्र यज्ञोपवीत धारण करने वाले महानुभाव को यज्ञोपवीत धारण करना अनिवार्य होता है|

एक सच्चे संन्यासी का यह विशेष और आवश्यक कर्तव्य है कि वह प्रतिदिन प्राणायाम करे| एक स्थान पर न रुके अपितु सब स्थान जाकर समाज के अन्य वर्गों तथा वर्णों के लोगों में वेद-ज्ञान का प्रचार-प्रसार करता रहे| समाज की राजनीति में न पड़े| एक सच्चा संन्यासी संसार की सुख-सुविधाओं को स्वेच्छा से त्याग कर अपनी आत्मोन्नति के मार्ग पर चलकर आध्यात्मिक क्षेत्र में पहुँच चुका होता है| उसका ध्येय है-आत्म निरीक्षण करना, परमात्मा का साक्षात्कार (आनन्द की अनुभूति) करना| वह ऐसी स्थिति में पहुँच चुका है कि उसे सांसारिक वस्तुओं से कोई लगाव या उसकी इच्छा नहीं होती| अब वह मुक्ति के मार्ग का राही है| यह सब सोच-समझ कर ही वह संन्यासाश्रम को ग्रहण करता है| कर्म का फल तीन प्रकार से प्राप्त होता है-१ . फल २. परिणाम और ३. प्रभाव| यज्ञ एक प्रकार का विज्ञान है और विज्ञान सबके उपकार या लाभ के लिये होता है| कर्म का फल सदैव कर्ता को ही प्राप्त होता है और जैसे कि यज्ञ का कर्ता यजमान होता है अतः यज्ञ का फल यजमान को ही प्राप्त होता है| यज्ञ का परिणाम है वायुमंडल को शुद्ध पवित्र करना| यज्ञ का प्रभाव सब जीवों पर पड़ता है और मुख्यतः यज्ञ में भाग ले रहे सभी अतिथियों पर अवश्य रूप से पड़ता है और उसका लाभ पहुँचाता है|

यज्ञ से आत्मोन्नति होती है, सबके प्रति प्रेम और श्रद्धा उत्पन्न होती है, मन में शान्ति का वास होता है, बिगड़े काम सँवर जाते हैं तथा उलझे काम सुलझ जाते हैं, घर में सुख-समृद्धि शान्ति आती है तथा स्वास्थ्य लाभ होता है, अर्थात् यज्ञ से सबका, सब प्रकार से भला ही भला होता है| जिससे हम या हमसे जो जाने-अनजाने में अहित या द्वेष करता है यज्ञ से उसका भी कल्याण होता है| यज्ञ एक प्रकार का विज्ञान (विशेष-ज्ञान) है, जिसके अनेक लाभ होते हैं और हानि किंचित् मात्र भी नहीं होती अतः यज्ञ करना सर्वश्रेष्ठ कार्य है जो सब मनुष्यों को करना चाहिये| 

yagya 1

यज्ञ कर्तव्य

यह ॠग्वेद का सुभाषित है कि ‘सब बलवान और उत्साही मनुष्यों का यह कर्तव्य है कि वे अपनी और समाज की उन्नति और कल्याण के लिए यज्ञकर्म किया करें’| वेदों में परम पिता परमात्मा को ‘आनंदस्वरूप’ कहा है क्योंकि परमात्मा आनंद का स्त्रोत है और जो उनके सान्निध्य में रहता है वह भी आनंदमय हो जाता है| परमात्मा को यज्ञस्वरूप भी कहते है क्योंकि उसके समस्त कार्य यज्ञमय (परोपकारार्थ) होते हैं अर्थात् सब जीवों के हितार्थ होते हैं| प्राचीन काल से ‘यज्ञ’ भारतीय संस्कृति और सभ्यता का एक अभिन्न अंग/चिन्ह् रहा है इसलिये भारतीय संस्कृति में हर शुभ कार्य करने से पूर्व ‘यज्ञकर्म’ करने का विधान है| प्रत्येक परोपकारी कार्य को ‘यज्ञ’ कहते है| यज्ञ (अग्निहोत्र/हवन) एक प्रकार का कर्मकांड है, सर्वश्रेष्ठ गुणों का प्रतीक है, जिससे याज्ञिक (यज्ञकर्ता) अनेक बातें सीख सकता है|

अग्नि प्रकाश का प्रतीक है, अग्नि से प्रकाश मिलता है तथा उसकी ज्वालाएँ ऊपर की ओर जाती है अतः वे हमें सिखाती है कि मनुष्य को अपने जीवन में सदा प्रकाश अर्थात् ज्ञान की प्राप्ति करनी चाहिए जिससे वह सदैव ऊपर अर्थात् प्रगति कके मार्ग पर अग्रसर रहे! घी स्नेह और मित्रता का प्रतीक है| सामग्री संगठन का प्रतीक है और समिधा समर्पण का प्रतीक है| ‘स्वाहा’ यज्ञ का आत्मा है अर्थात् ‘स्वाहा’ के बिना यज्ञ करना निरर्थक है! ‘इदं न मम’ यज्ञ के प्राण हैं| यदि आप निष्काम कर्म की भावना से करते है तो वह सब यज्ञकर्म कहलाता है! अगर आप किसी प्यासे प्राणी (मनुष्य, पशु-पक्षी इत्यादि) को जल पिलाते हैं, भूखे व्यक्ति या पशु को भोजन खिलाते हैं, किसी दुःखी व्यक्ति के दुःख को कम करने का प्रयास करते हैं, किसी जरूरतमंद गरीब रोगी को औषधि दिलाते हैं, कमजोर वर्ग के बच्चे को पढ़ाते है या उसकी पढ़ाई के लिये प्रबंध करते हैं, रोते बच्चे को हँसाते हैं इत्यादि अनेक कार्य हैं ये सभी यज्ञ कर्म कहाते है! यदि आपकी कमाई का दान सुपात्र को जाता है, अस्पतालों में रोगियों के इलाज के लिए जाता है, अनाथालयों में जाता है, वृद्धाश्रमों में जाता है, वैदिक गुरुकुलों में जाता है इत्यादि और भी अनेक संस्थाओं में जाता है तो ये सब यज्ञकर्म हैं| इससे आपके धन का सदुपयोग होता है! यही निष्काम कर्म है और यही यज्ञकर्म है| यज्ञ करने से ईश्वर के प्रति ‘श्रद्धा और प्रेम’ उजागर होता है, मन में शांति और एकाग्रता आती है, आपसी मित्रता बढ़ती है, प्रदूषण की निवृत्ति होती है|

यज्ञकर्म सूर्य के प्रकाश के होते ही करना चाहिये क्योंकि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लाभकारी होता है| विवाह संस्कार के निमित्त बनी यज्ञशाला को ‘कल्याणमण्डप’ कहते है| बृहद् यज्ञो में ब्रह्मा (यज्ञ निरीक्षक), अध्वर्यु (यज्ञ मण्डप की व्यवस्था करने वाला एवं ॠग्वेद के मंत्रो का सस्वर पाठ करने वाला) के आसन निर्धारित होते है| साधारण साप्ताहिक यज्ञ में ब्रह्मा नहीं होता मात्र पुरोहित और यजमान होते है| होता या यजमान का आसन पश्चिम में और मुख पूर्व दिशा में निर्धारित होता है| यज्ञ के ब्रह्मा तथा पुरोहित का आसन दक्षिण में और मुख उत्तर दिशा की ओर सुरक्षित होता है| अध्वर्यु का आसन उत्तर में व मुख दक्षिण दिशा में होता है| उद्गाता का आसन पूर्व में और मुख पश्चिम दिशा में सुरक्षित होता है| हवनकुण्ड यज्ञशाला के मध्य में रखा जाता है| यज्ञ का आयोजन करने वाले यजमान को इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिये कि ब्रह्मा का आसन उपस्थित यजमान तथा दर्शकों से थोड़ा सा ऊँचा (याग्निक के स्तर में थोड़ा सा नीचे) हो ताकि वह यज्ञकर्म की सम्पूर्ण गतिविधियों का अच्छी तरह से निरीक्षण कर सके|

यज्ञ में कोई त्रुटी न हो, इसका पूरा उत्तरदायित्व ब्रह्मा पर होता है| ब्रह्मा/यजमान का आसन यज्ञाग्नि के स्तर से ऊँचा होना चाहिये| ‘यज्ञोपवीत’ यज्ञ करने का अधिकार प्रदान करता है, शुभकर्म करने की प्रेरणा देता है और अशुभ कर्मो से बचाता है| यज्ञोपवीत वैदिक संस्कृति और सभ्यता का एक प्रतीक है| वैदिक धर्मानुसार ‘सन्यासाश्रम में प्रवेश करने वाले इच्छुक व्यक्तियों का धारण किया हुआ यज्ञोपवीत उतार दिया जाता है क्योंकि सन्यासियों का पूरा जीवन ‘यज्ञमय’ (अग्निरूप परोपकारार्थ) होता है| सन्ध्या (परमात्मा का ध्यान) करने का अधिकार सब मनुष्यों को समान रूप से प्राप्त है| यज्ञोंपयोगी सावधानियाँ-यज्ञ (अग्निहोत्र/हवन) के प्रयोग में आने वाले पात्र (बर्तन) स्वर्ण, चाँदी, ताम्बे के धातु के या काष्ठ के होने चाहिये (संस्करविधि)|

सामान्यतः इन पात्रों की आवश्यकता पड़ती है-एक दीपक , घी रखने के लिये एक चौड़ा पात्र (आज्यस्थाली) तथा एक लम्बी स्रुवा (लम्बी पकड़ वाला चम्मच), एक कलश (प्रोक्षणीपात्र) जिससे जल सेचन करते हैं| सामग्री के चार और स्थालीपाक आदि रखने के लिए (शाकल्यपात्र) पात्र, चार आचमन पात्रों के साथ में चार छोटे चम्मच, एक पात्र में उबले हुए थोड़ी मात्रा में नमक-रहित या मीठे चावल, एक नारियल तथा आम के पत्तों से ढका जल से भरा एक कलश (अग्निपुराण) जो जल प्रसेचन के काम आता है| अग्नि प्रदीप्त करने करने के लिये आठ अंगुल लम्बी (लगभग 7”) तथा उँगलियों जितनी पतली तीन समिधाएँ (चन्दन की समिधाएँ) चन्दन की समिधाएँ हों तो बेहतर)| उपर्युक्त के अतिरिक्त चार हाथ पोंछने के छोटे सूती वस्त्र या Napkins या Tissue Papers और यजमानों एवं अतिथियों के लिये यज्ञोपवीत उपलब्ध होने चाहियें|

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यज्ञ क्या क्यों कैसे?

अग्न्याधान से पूर्व, अग्नि प्रज्वलित करने के लियेएक नई दीयासलाई, कपूर, (या सूखे नारियल के पतले लम्बे टुकड़े), एक पंखा और एक चिमटा पास में रखा होना चाहिए| यज्ञ में काम आने वाली सभी वस्तुएँ जैसे यज्ञ-शाला यज्ञ-कुण्ड , यज्ञ-पात्र, सामग्री, समिधाएँ तथा आसनों इत्यादि की स्वच्छता और शुद्धता का ध्यान रखना जरुरी है क्योंकि इन्हीं से याज्ञिक के मन में यज्ञ के प्रति श्रद्धा और प्रेम जागृत होता है जो यज्ञ-कर्म के लिए परमावश्यक है| प्रायः देखा गया है की अधिकतर याज्ञिक तथा अतिथिगण पौराणिकों की देखा-देखी आचमन के पश्चात् आचमन वाले हाथ को अपने सर के ऊपर से ले जाते हैं जो सरासर अवैदिक पद्धति है| आचमन वाले गीले हाथ को स्वच्छ वस्त्र (नैप्किन या रुमाल) से पोंछ देना चाहिए|

समिदाधान:-समिदाधान की तीन समिधाएँ यजमान (पति) द्वारा एक-एक करके अर्पित की जाती हैं| यजमान की धर्मपत्नी का कर्तव्य है कि वह भी पति के हाथों को नीचे से स्पर्श करे| अग्नि प्रदीप्त करने के लिये चन्दन या पलाशादि की तीन समिधाएँ (आठ अंगुल लगभग 7” लम्बी और मोटाई अंगूठे के परिमाण से अधिक न हो (ऐसा कात्यायन ऋषि का मत है) पूरी तरह से घी पात्र में डूबी होनी चाहिए| इन समिधाओं पर सामग्री नहीं लगानी चाहिये| एक-एक समिधा को घी पात्र से निकालकर, दोनों हाथों की दसों उंगलीयों से स्पर्श करते हुए मंत्रोच्चारण की समाप्ति पर यज्ञकुंड में प्रज्वलित अग्नि के ऊपर (पहली समिधा उत्तर में, दूसरी दक्षिण में, और तीसरी समिधा मध्य में) श्रद्धापूर्वक चढ़ावें| यहाँ घी या सामग्री की आहुति देने का विधान नहीं है और न ही समिदाधान के बीच में दूसरी समिधा/समिधाएँ चढ़ाने का नियम है| समिदाधान के पश्चात् ही छोटी और मोती समिधाएँ रखी जा सकती हैं| तदन्तर अग्नि प्रज्वलित करने हेतु पाँच घृताहुति-मन्त्रों में केवल घृत की आहुतियाँ एक-एक मन्त्र की समाप्ति पर ‘स्वाहा’ के साथ प्रदान की जाती हैं| जल-प्रसेचन विधि इस प्रक्रिया को समझने के लिये आपको यह जान लेना चाहिये की यज्ञ–प्रक्रियाओं में अथवा पश्चिम दिशा से आरम्भ होकर पूर्व दिशा में समाप्त होता है| इसी प्रकार जहाँ पर जलधारा समाप्त होती है, वहाँ से जल छिड़कने के लिये जल के समाप्त छोर से अन्दर की ओर से आरम्भ होता है| जल छिड़कने का कार्य हवनकुण्ड की निचली मेखला से नौ इंच (9’) भूमि छोड़कर जल छिड़का जाता है| जल छिड़कते समय घृत सामग्री आदि सम्पूर्ण हवि-द्रव्य जलधारा के अन्दर की ओर होने चाहिये|

यज्ञ में काम आने वाली लड़कियों को लकड़ी न कहकर ‘समिधा’ कहते हैं| यज्ञकुण्ड के परिणाम के हिसाब से, यज्ञ के लिये उपयोगी छोटी=बड़ी सब समिधाओं को यज्ञकुण्ड में चढ़ाने (डालने) से पहले अच्छी तरह से साफ करके धुप में पूर्णरूप से सुखा लेना चाहिये ताकि उसमें से जीव-जन्तु निकल जाएँ और नहीं होती और धुआँ उत्पन्न होता है जो स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है| (संस्कारविधि)| कोयला जलाकर यज्ञ नहीं किया जाता| यज्ञाग्नि में पशु-मांस इत्यादि अभक्ष्य पदार्थों की आहुति देना वर्जित है| निरुक्त 2.7 में ‘यज्ञ’ को ‘अध्वर’ की संज्ञा दी गई है अर्थात् यज्ञकर्म में किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं होती| अतः अग्नि में डालने से पहले समिधाओं की ध्यानपूर्वक जाँच कर लेनी चाहिये की उसमें कोई जीव-जन्तु तो नहीं हैं| जिस लकड़ी के जलने से कार्बन-डाई-आँक्साइड गैस की मात्रा कम से कम निकलती हो| जिस लकड़ी के जलने से कार्बन-मोनो-आँक्साइड उत्पन्न न होती हो या अन्य कोई विषैली गैस पैदा न होती हो| लकड़ी कठोर नहीं हो| वृक्ष की लकड़ी जिस के पत्ते तोड़ने पर दूध जैसा द्रव्य निकलता हो| ऐसी लकड़ी जो जलने पर रख हो जाती है, कोयला नहीं| चन्दन, आम, पीपल, बड़, गूलर, पलाश, शमी जैसे वृक्षों की लकड़ियाँ समिधा के रूप में प्रयोग करनी उचित होती हैं| ऋग्वेद के मन्त्र (८.१०२.21) में स्पष्ट आज्ञा प्रदान है कि ‘जिस वृक्ष की लकडियों को दीमक या उसकी जाती का कोई कीट (कीड़ा) खाता है, वहसब पीपल, ढाक आम, आदि की कोमल लकड़ियाँ तेरा प्रदीपक हैं| अर्थात् उपर्युक्त वृक्ष की लकड़ी को समिधा के उपयोग में लाना उचित है| अध्वर अर्थात् हिंसा रहित (ऋग्वेद: १.१.८,ऋ. १.२६.१, ऋ. १.४४.१३), (यजुर्वेद: १.१, ३.23, ६.11), (अथर्ववेद: ४.24.३, १.४.२, ५.12.२, 18.२.२) और (मनुस्मृति: ३.१६) इत्यादि, ऐसे अनेक मन्त्र हैं जिनमें कहा गया है कि ‘सब प्रकार के जीवों की रक्षा करो’, ‘उनकी हत्या मत करो’|

यज्ञ में किसी भी प्रकार के पशु-मांस का प्रयोग करना वर्जित ही नहीं, घोर अपराध है-महा-पाप है| ‘स्वाहा’ उच्चारण किये बिना आहुति देना व्यर्थ है| ‘स्वाहा’ को यज्ञ का ‘आत्मा’ कहा गया है| ‘स्वाहा’ का अर्थ है त्याग और समर्पण भाव से प्रदान करना| स्वाहा के उच्चारण से अहंकार/अभिमान समाप्त होता है| अतः चहिये| स्वाहा शब्द के अनेक अर्थ हैं| वैदिक विद्वानों के अनुसार सु+आह=स्वाहा=(१) सुमधुर बोलो| (२) सत्य बोलो और अपनाओ| (३) जो मन में है, वही वाणी से बोलो और अपने कहे अनुसार कर्म करो अर्थात् मन-वचन-कर्म में कोई अन्तर न हो| (४) जो कर्म करो समर्पण भावना से करो| (५) त्यागपूर्वक कर्म करो| (६) स्वाहा का अर्थ होता है-काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, राग-द्वेष, मन-अपमान, चुगली, अहंकार, बदले की भावना इत्यादि जैसे अपने अन्दर छुपी हुई बुराइयों को आहुत करना| शुध्द घी तथा सामग्री की आहुतियाँ मन्त्रोच्चारण के अंत में ‘स्वाहा’ उच्चारण के साथ यज्ञ कुण्ड के मध्य में प्रज्वलित अग्नि के ऊपर ही ठीक प्रकार से प्रदान करनी चहिये जिससे घी या सामग्री यज्ञ कुण्ड के बाहर न गिरने पाये| यह यज्ञ की एक विशेष आचार-संहिता है-‘पहले मंत्र पाठ तदनन्तर क्रिय’ और इस अनुशासन का पालन यज्ञ में भाग ले रहे, यज्ञवेदी पर बैठे, सभी सदस्यों को अनिवार्य रूप से करना चाहिये| मंत्रोच्चारण के पश्चात् ‘स्वाहा’ के साथ ही यज्ञकुंड में अग्नि में शुध्द घृत तथा सामग्री की आहुति प्रदान करनी चाहिये| (शतपथब्राह्राण: १.५.३.१३, ३.३.२.7) ‘स्वाहा यज्ञं कृणोत्न’ (ऋग्वेद: १.१३.१२) इस मन्त्रांश में भी वही आदेश है कि ‘मंत्रोच्चारण के पश्चात् ही ‘स्वाहा’ उच्चारण के साथ ही आहुति प्रदान करने की क्रिया करनी चाहिये|’ प्रत्येक मनुष्य को कम से कम सोलह आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिए और अधिक आहुतियाँ देने की इच्छा हो तो ‘ॐ विश्वानि देव सवित्दुर्रितानि परा सुव| यद् भद्रं तन्न आ सुव||’ इस मंत्र और पूर्वोक्त गायत्री मंत्र; (ॐ भूभुर्वः स्वः| तत्सवितुर्व-रेणयं भर्गो देवस्य धीमहि| धियो यो नः प्रचोदयात्||) से आहुति देनी चाहियें| सामग्री को तीन १. अनामिका (हाथ की दूसरी उंगली जिसमें अँगूठी पहनते हैं), २. मध्यमा (बीच की लम्बी उंगली) और ३. (अँगूठे) से पकड़ना चाहिये| ‘स्विष्टकृत आहुति’ का अर्थ है ‘इष्टसुखकारिणी’ अर्थात् अच्छे प्रकार से चाहे हुए सुख को (प्रदान) करने वाली आहुति (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाः राजधर्मविषय) स्विष्टकृत़् अर्थात् अच्छे प्रकार से सुख को करने वाला| प्रधान यज्ञ के पश्चात् ही स्विष्टकृत आहुति देने का विधान है| यह आहुति प्रधान हवन की पुष्कलता के लिये होती है अतः यज्ञ की समाप्ति पर ही दि जाती है, पहले नहीं| किसी भी सुपात्र व्यक्ति या संस्था के कल्याण तथा उत्थान हेतु प्रदान की जाने वाली सहायता राशी तथा वस्तु ‘दान’ कहाती है|

‘दान’ श्रध्दा और प्रेम से भेंट किया जाता है| यज्ञ के सन्दर्भ में ‘दान’ की परिभाषा है-त्याग एवं समर्पण भाव से अपना सर्वस्व ईश्वर को अर्पित करना| स्मरण रहे की दान माँगा नहीं जाता, अपनी इच्छा से भेंट किया जाता है| दान की वस्तुएँ-फल, वस्त्र, बरतन, आभूषण, धनराशी इत्यादि अनेक उपयोगी वस्तुएँ भेंट की जा सकती हैं| विद्या-दान सर्वश्रेष्ट दान कहाता है| (ऋ.१.१२०.६) उत्तम दाता उसको कहते हैं जो देश, काल और पात्र को जानकर सत्य विद्या, धर्म की उन्नति रूप परोपकारार्थ देवे| सत्यपुरुषों की ही सेवा और सुपात्रों को दान किया करो| (यजु. १.१०२.५) यज्ञ के ब्रह्मा का कर्तव्य/काम है यज्ञकर्म की गतिविधियों का बारीकी से निरीक्षण करना, होने वाली त्रुटियों को सुधारना तथा मार्गदर्शन करना| यदि यज्ञ के दौरान त्रुटियाँ राह जाती हैं तो उसका उत्तरदायित्व ब्रह्मा पर होता है| देखा गया है कि ब्रह्मा/पुरोहितगण यज्ञकर्म कराने के बदले में अपने समय का मुआवज़ा ‘धन’ माँगते हैं जो एक अवैदिक परम्परा है| यज्ञकर्म करने से यजमान को सांसारिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है, मोक्ष की नहीं| मोक्ष की प्राप्ति होती है-वेदाध्ययन करके वेदोक्त आचरण से, मन, वचन और कर्म द्वारा सत्याचरण से, पातंजलि अष्टांग योग के अभ्यास से तथा निष्काम कर्मो के करने से और ईश्वर समर्पण से|

स्वर्ग कहते हैं-संसार में सब सुख-सुविधओं के साथ जीवन जीने को, अनुकूल परिस्थितियों में जीने को, जिस घर में नित-प्रतिदिन संध्योपासना होती हो, नियमित रूप से यज्ञ होता हो, घर में सुख-सम्पत्ति-समृद्धि हो, शांति हो, सुशिक्षित धर्मपत्नी और चरित्रवान पति हो, उनकी आज्ञाकारी संतानें हो, वैदिक सन्यासियों, विद्वानों, अतिथियों और मित्रो का आवागमन हो, सभी एक-दूसरे की बात मानते हों आदि जहाँ ऐसी परिस्थितियॉ हों, समझो वह घर स्वर्ग है अन्यथा विपरीत परिस्थितियों को ‘नरक’ कहते हैं| सांसारिक सुख का सम्बन्ध भौतिक शरीर से होता है अतः सुख में कहीं न कहीं दुःख मिश्रित होता है और सुख का अंत दुःख ही होता है अतः हमें मोक्ष की तीव्र इच्छा रखनी चाहिये| मोक्ष अर्थात् सब प्रकार के दुःखो से छुट जाना| हवन से वायु शुध्द होकर सुवृष्टि होती है, उससे शरीर निरोग और बुध्दी विशद होती है, विद्या प्राप्त होती है और स्वर्ग अर्थात् सुख की प्राप्ति होती है| (उपदेशमंजरी) |